चाय की दुकान
वर्ष 2005 से ही चाय की इस दुकान पर जाना होता है । जहां विभिन्न व्यवसायों में लगे आम आदमी, मजदूर, मिस्त्री, रिक्शा चालक इत्यादि आकर दोपहर का भोजन करते हैं और चाय भी पीते हैं । चूंकि हफ्ते में तो एक बार चला ही जाता था तो काफी सारे लोगों से आत्मीयता भी हो गई थी । जिनमें से एक थे रिक्शा चालक श्री जुगनू। आज पता चला कि 10 दिन पहले उनका देहांत हो गया । शरीर कमजोर हुआ तो रिक्शा चलाना छोड़ कर किसी शादी मंडप में माली का काम करने लगे और वहीं सो जाया करते थे । कोई आगे पीछे भी नहीं था । ऐसी ही अनेकों कहानियां इन दुकानों पर मिलती हैं । आम आदमी के जीवन संघर्ष की अनूठी सच्ची कहानियां । कुछ सुखद तो कुछ दुखद भी होती हैं । नीरज भाई जिनकी यह दुकान है अपना मेनू भी इन लोगों की ही आवश्यकता के अनुसार रखते हैं जिसमें दोपहर को छोले, पूरी, दही और समोसा जरूर रहता था ।कई लोग अपनी रोटी लेकर आते हैं और यहां से छोले लेते हैं, बहुत से छोले समोसे से भी काम चला लेते हैं कई बार बजट के अनुसार लोगों को कम भी खाते देखता हूं । बोहनी की भी बात होती हैं और काम न मिलने की भी । आज इक्कीस वर्षों के बाद भी नीरज भाई ने अपना मेनू नहीं बदला, मैं अक्सर बोलता कि भाई कुछ ऐसा कर लो वैसा कर लो दुकान को थोड़ा आकर्षक सा बना लो तो भाई का यहीं बोलना था कि भाई साहब मेरा ग्राहक आम आदमी है ज्यादा स्टैंडर्ड कर दूंगा तो वो दुकान में आते हुए डरेगा की रेट तो ज्यादा नहीं होंगे । इसलिए आज इन बीस वर्षों में भी उनके ग्राहक आते रहते हैं और मेरा भी उनसे बराबर मिलना जुलना हो जाता है। उनके यहां आज भी बीस रुपए में छोले और थोड़ी दही मिल जाती है जिसे लेकर भी ये कामगार जाते हैं ताकि साथ वाला अपने कार्यस्थल पर ही घर से लाई अपनी रोटी खा ले ।
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