गांव का स्कूल और मंदिर
पिछले 11 वर्षों में पहाड़ों के गांव गांव में जाने का अवसर मिला है । आजकल गांव गांव में अपने स्थानीय देवताओं के जो मंदिर पुराने हो चुके थे अब उन्हें नए कलेवर में और भी ज्यादा भव्य बनाया जा रहा है । मंदिर निर्माण का कार्य करोड़ों का पड़ता है क्योंकि देवदार की ही लकड़ी और फिर इन पर नक्काशी करने वाले कारीगर भी मुश्किल से मिल पाते हैं । मंदिर निर्माण में पूरे गांव के हर परिवार को यथा संभव सहयोग देना होता है तथा जो लोग गांव से बाहर अच्छी नौकरियों में होते हैं वो भी अपना अंशदान देते हैं । सामुदायिक सहयोग की यह भावना देख कर बहुत अच्छा लगता है किंतु जब बात उसी गांव के प्राइमरी स्कूल के लिए कुछ करने की आती है तो सारी जिम्मेदारी सरकार और गुरुजी पर ही छोड़ दी जाती है । प्राइमरी स्कूल छोटी मोटी मरम्मत के लिए भी तरसते रहते हैं यहां तक कि कई बार स्कूल के पीने के पानी की भी पाइप लाइन गांव के लोग बाधित कर देते हैं कि यह पानी तो गाँव का है स्कूल का नहीं । यानी मंदिर अपना और स्कूल सरकारी गांव अपना और गांव का प्राइमरी स्कूल सरकारी ...