मोरी की पगडंडियों पर शिक्षा की अलख — एक कर्मयोगी की कहानी”
एक कर्मयोगी की प्रेरक कहानी — पंकज कुमार
उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले का मोरी विकासखंड। चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पहाड़, घने जंगल, कल-कल बहती नदियाँ और प्रकृति की अद्भुत सुंदरता। लेकिन इस सुंदरता के बीच जीवन की कुछ ऐसी चुनौतियाँ भी हैं, जिन्हें वही समझ सकता है जिसने इन पहाड़ों की दुर्गम पगडंडियों पर चलकर मंजिल तक पहुँचने का प्रयास किया हो।
कहीं सड़क नहीं, कहीं मोबाइल नेटवर्क नहीं, तो कहीं विद्यालय तक पहुँचने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। इन कठिन परिस्थितियों में बच्चों के भविष्य को सँवारने और शिक्षा की रोशनी को हर गाँव तक पहुँचाने के संकल्प के साथ निरंतर प्रयासरत हैं — पंकज कुमार, खंड शिक्षा अधिकारी, मोरी।
एक अधिकारी, जो केवल कार्यालय तक सीमित नहीं
सरकारी व्यवस्था में किसी अधिकारी की पहचान अक्सर उसके पद, कार्यालय और प्रशासनिक अधिकारों से होती है। लेकिन पंकज कुमार के लिए उनके पद का वास्तविक अर्थ कार्यालय की चारदीवारी से कहीं अधिक व्यापक है।
उनके लिए शिक्षा विभाग का वास्तविक कार्यक्षेत्र वे दूरस्थ विद्यालय हैं, जहाँ बच्चों की आँखों में सपने हैं, शिक्षकों के सामने चुनौतियाँ हैं और संसाधनों की कमी के बावजूद भविष्य को बेहतर बनाने की उम्मीद जीवित है।
दुर्गम रास्ते, घने जंगल और लंबी पैदल यात्राएँ उनके लिए अपने कर्तव्य से पीछे हटने का कारण नहीं, बल्कि उस कर्तव्य की वास्तविक परीक्षा हैं।
भारतीय नौसेना से पहाड़ों की शिक्षा सेवा तक
पंकज कुमार के जीवन में अनुशासन, संघर्ष और सेवा का विशेष स्थान है। भारतीय नौसेना में लगभग 15 वर्षों की सेवा ने उनके जीवन में कर्तव्यनिष्ठा और अनुशासन के संस्कारों को मजबूत किया।
नौसेना में देशसेवा के बाद उन्होंने उत्तराखंड की सरकारी व्यवस्था में अपनी सेवाएँ दीं। सचिवालय में समीक्षा अधिकारी के रूप में कार्य करने से लेकर शिक्षा विभाग में जिम्मेदारियाँ निभाने तक उनकी यात्रा निरंतर आगे बढ़ती रही।
वर्ष 2015 में उनकी शिक्षा विभाग की क्षेत्रीय सेवा की यात्रा शुरू हुई। चकराता जैसे दुर्गम क्षेत्र में कार्य करने के बाद नवंबर 2023 में उन्होंने मोरी विकासखंड की जिम्मेदारी संभाली।
उनके लिए मोरी केवल एक नई प्रशासनिक नियुक्ति नहीं थी, बल्कि उन बच्चों तक पहुँचने का अवसर था, जिनके विद्यालयों तक पहुँचना ही अपने आप में एक चुनौती है।
एक सैनिक ने वर्दी में देश की सेवा की थी; अब वही अनुशासन और समर्पण शिक्षा के माध्यम से समाज का भविष्य सँवारने में लगा है।
जब मंजिल तक पहुँचने के लिए जंगलों से गुजरना पड़े
कल्पना कीजिए, एक अधिकारी दूरस्थ विद्यालय के लिए निकलता है। रास्ते में पहाड़ी पगडंडियाँ हैं, घने जंगल हैं और कहीं-कहीं रास्ता पहचानना भी कठिन हो जाता है।
न आसान सड़क, न हर जगह संपर्क का साधन। फिर भी यात्रा जारी रहती है, क्योंकि मंजिल पर बच्चे इंतजार कर रहे हैं और उनके विद्यालय की स्थिति जानना आवश्यक है।
देवटी जैसे सड़कविहीन गाँव तक पहुँचने का अनुभव इस संघर्ष को और स्पष्ट करता है। लगभग आठ किलोमीटर की कठिन पैदल यात्रा, करीब चार घंटे का समय और जंगल में दो बार रास्ता भटक जाने जैसी परिस्थितियों के बावजूद मंजिल तक पहुँचने का प्रयास केवल शारीरिक साहस की कहानी नहीं, बल्कि कर्तव्य के प्रति समर्पण का उदाहरण है।
पहाड़ों में दूरी केवल किलोमीटर में नहीं मापी जाती। कई बार आठ किलोमीटर का रास्ता मैदानी क्षेत्र के लंबे सफर से भी अधिक कठिन होता है।
और जब ऐसी यात्रा का उद्देश्य किसी विद्यालय, शिक्षक या बच्चे तक पहुँचना हो, तो उसका महत्व और बढ़ जाता है।
शिक्षा केवल आदेशों से नहीं, अपनत्व से भी आगे बढ़ती है
एक अच्छे शिक्षा अधिकारी की भूमिका केवल निरीक्षण करना, कमियाँ गिनाना या निर्देश जारी करना नहीं है। उसकी भूमिका शिक्षकों का मनोबल बढ़ाने, विद्यालयों की वास्तविक समस्याओं को समझने और बच्चों के लिए बेहतर वातावरण बनाने में भी है।
पंकज कुमार की कार्यशैली का एक महत्वपूर्ण पक्ष मानवीय संवेदनशीलता है। वे शिक्षकों और विद्यार्थियों से संवाद, विद्यालयों के दौरे और प्रोत्साहन को महत्व देते हैं।
कभी किसी विद्यालय में बच्चों के साथ समय बिताना, कभी बालिकाओं के लिए विशेष भोज की व्यवस्था करना, तो कभी त्योहारों के अवसर पर छात्रावास की बालिकाओं के साथ मिठाई बाँटना — ये छोटे-छोटे प्रयास एक बड़ा संदेश देते हैं।
बच्चों को केवल किताबों की जरूरत नहीं होती; उन्हें यह एहसास भी चाहिए कि कोई उनकी परवाह करता है।
जब कोई अधिकारी बच्चों के बीच बैठता है, उनके साथ भोजन की खुशी साझा करता है और उनके जीवन में अपनत्व का अनुभव जोड़ता है, तब प्रशासन का चेहरा अधिक मानवीय बन जाता है।
क्योंकि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि ऐसे नागरिकों का निर्माण करना है जो स्वयं को सम्मानित और समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा महसूस करें।
मोरी के दूरस्थ विद्यालय: चुनौतियाँ भी, उम्मीदें भी
दुर्गम क्षेत्रों में शिक्षा की चुनौतियाँ अनेक हैं। शिक्षकों की उपलब्धता, भौगोलिक कठिनाइयाँ, संचार सुविधाओं का अभाव और डिजिटल व्यवस्थाओं का संचालन — इन सबके बीच विद्यालयों को सुचारु रूप से चलाना आसान नहीं है।
ऐसी परिस्थितियों में एक अधिकारी को केवल नियमों की जानकारी होना पर्याप्त नहीं। उसे स्थानीय परिस्थितियों की समझ, समस्याओं को सुलझाने की इच्छाशक्ति और टीम के साथ काम करने की क्षमता भी चाहिए।
पंकज कुमार का प्रयास है कि मोरी के दूरस्थ विद्यालय भी शिक्षा व्यवस्था की मुख्यधारा से जुड़े रहें। ऑनलाइन सूचनाओं और विभागीय प्लेटफॉर्म पर कार्य करने से लेकर विद्यालयों की जमीनी परिस्थितियों को समझने तक, इस जिम्मेदारी के कई ऐसे पहलू हैं जो आम लोगों की नजरों से दूर रह जाते हैं।
कई बार अवकाश के दिनों में भी विभागीय कार्य पूरे करने के लिए टीम के साथ जुटना पड़ता है। यह काम हमेशा सुर्खियाँ नहीं बनाता, लेकिन व्यवस्था को चलाए रखने में इसकी अपनी भूमिका होती है।
एक अधिकारी की असली सफलता क्या है?
क्या सफलता केवल पदोन्नति है? क्या वह किसी बड़े कार्यालय में बैठने का अवसर है? या फिर वह सम्मान है जो लोगों के मन में आपके लिए पैदा होता है?
मोरी की पहाड़ियों में काम करने वाले किसी शिक्षा अधिकारी की सफलता का एक पैमाना यह भी है कि कोई बच्चा नियमित रूप से विद्यालय आने लगे, कोई शिक्षक कठिन परिस्थितियों में भी अपने काम के प्रति प्रेरित रहे, कोई बालिका अपने सपनों को आगे बढ़ाने का साहस जुटाए और कोई दूरस्थ विद्यालय व्यवस्था से जुड़ाव महसूस करे।
इनमें से प्रत्येक उपलब्धि का महत्व है, भले ही वह किसी बड़ी खबर का हिस्सा न बने।
पंकज कुमार की कहानी किसी एक व्यक्ति को असाधारण बताने भर की कहानी नहीं, बल्कि उस जिम्मेदारी की कहानी है जो तब और कठिन हो जाती है जब संसाधन सीमित हों और अपेक्षाएँ बड़ी हों।
यह हमें याद दिलाती है कि सरकारी पद अधिकार के साथ-साथ उत्तरदायित्व भी देता है। जब उस उत्तरदायित्व के साथ संवेदनशीलता जुड़ जाती है, तो प्रशासन लोगों के जीवन को बेहतर बनाने का माध्यम बन सकता है।
पहाड़ों की पगडंडियों से निकलती एक प्रेरणा
मोरी की पहाड़ियों में हर दिन एक नई चुनौती लेकर आता है। मौसम बदलता है, रास्ते कठिन होते हैं और दूरियाँ कभी-कभी हौसले की परीक्षा लेती हैं।
लेकिन इन सबके बीच शिक्षा की यात्रा रुकनी नहीं चाहिए।
पंकज कुमार की कार्ययात्रा हमें संदेश देती है कि सेवा का वास्तविक अर्थ केवल अपनी जिम्मेदारी निभाना नहीं, बल्कि उन लोगों तक पहुँचना भी है जिनके लिए व्यवस्था तक पहुँचना स्वयं एक कठिन संघर्ष है।
उनके सामने अभी भी अनेक चुनौतियाँ हैं और किसी एक व्यक्ति के प्रयास से पूरी व्यवस्था की सभी समस्याएँ समाप्त नहीं हो सकतीं। फिर भी हर विद्यालय तक पहुँचने का प्रयास, हर बच्चे के प्रति संवेदनशीलता और हर शिक्षक को साथ लेकर चलने की भावना सकारात्मक बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
क्योंकि इतिहास हमेशा केवल बड़े भवन बनाने वालों को याद नहीं रखता। कभी-कभी वह उन लोगों को भी याद रखता है जो कठिन रास्तों पर चलते हुए दूसरों के लिए रास्ता आसान बनाने का प्रयास करते हैं।
और शायद यही एक सच्चे कर्मयोगी की पहचान है — जहाँ जिम्मेदारी हो, वहाँ उपस्थित रहना; जहाँ कठिनाई हो, वहाँ प्रयास करना; और जहाँ उम्मीद की जरूरत हो, वहाँ अपने कर्मों से विश्वास जगाना।
मोरी की पहाड़ियों में शिक्षा की यह यात्रा जारी है। हर पगडंडी के उस पार एक विद्यालय है, हर विद्यालय में कुछ सपने हैं और हर सपने के भीतर एक बेहतर भविष्य की संभावना।
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