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Showing posts from October, 2026

चाय की दुकान

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वर्ष 2005 से ही चाय की इस दुकान पर जाना होता है । जहां विभिन्न व्यवसायों में लगे आम आदमी, मजदूर, मिस्त्री, रिक्शा चालक इत्यादि आकर दोपहर का भोजन करते हैं और चाय भी पीते हैं । चूंकि हफ्ते में तो एक बार चला ही जाता था तो काफी सारे लोगों से आत्मीयता भी हो गई थी । जिनमें से एक थे रिक्शा चालक श्री जुगनू। आज पता चला कि 10 दिन पहले उनका देहांत हो गया । शरीर कमजोर हुआ तो रिक्शा चलाना छोड़ कर किसी शादी मंडप में माली का काम करने लगे और वहीं सो जाया करते थे । कोई आगे पीछे भी नहीं था । ऐसी ही अनेकों कहानियां इन दुकानों पर मिलती हैं । आम आदमी के जीवन संघर्ष की अनूठी सच्ची कहानियां । कुछ सुखद तो कुछ दुखद भी होती हैं । नीरज भाई जिनकी यह दुकान है अपना मेनू भी इन लोगों की ही आवश्यकता के अनुसार रखते हैं जिसमें दोपहर को छोले, पूरी, दही और समोसा जरूर रहता था । कई लोग अपनी रोटी लेकर आते हैं और यहां से छोले लेते हैं, बहुत से छोले समोसे से भी काम चला लेते हैं कई बार बजट के अनुसार लोगों को कम भी खाते देखता हूं । बोहनी की भी बात होती हैं और काम न मिलने की भी । आज इक्कीस वर्षो...

My Life at Different Ages

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An autobiographical reflection on age, career, family, responsibilities and the lessons that only life can teach. At 17: A Young Boy with Dreams of His Own I joined the Indian Navy at the age of 17 years and 3 months. It was the beginning of my professional life, but in many ways, I was still a boy learning to understand the world. My first job took me far away from home. Life in the Navy meant discipline, training, responsibilities and long periods of separation from family. We generally got an opportunity to visit home only twice a year. After completing my training, I was posted to Goa. Our official working hours were until 5 PM, but I often noticed that some of our seniors continued sitting in the office until 7 PM. Most of them were married and living with their families in residential quarters located about six to eight kilometres away from the workplace. As a young sailor, I could never understand their behaviour. Why would ...

मोरी की पगडंडियों पर शिक्षा की अलख — एक कर्मयोगी की कहानी”

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मोरी की पगडंडियों पर शिक्षा की अलख एक कर्मयोगी की प्रेरक कहानी — पंकज कुमार उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले का मोरी विकासखंड। चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पहाड़, घने जंगल, कल-कल बहती नदियाँ और प्रकृति की अद्भुत सुंदरता। लेकिन इस सुंदरता के बीच जीवन की कुछ ऐसी चुनौतियाँ भी हैं, जिन्हें वही समझ सकता है जिसने इन पहाड़ों की दुर्गम पगडंडियों पर चलकर मंजिल तक पहुँचने का प्रयास किया हो। कहीं सड़क नहीं, कहीं मोबाइल नेटवर्क नहीं, तो कहीं विद्यालय तक पहुँचने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। इन कठिन परिस्थितियों में बच्चों के भविष्य को सँवारने और शिक्षा की रोशनी को हर गाँव तक पहुँचाने के संकल्प के साथ निरंतर प्रयासरत हैं — पंकज कुमार, खंड शिक्षा अधिकारी, मोरी। एक अधिकारी, जो केवल कार्यालय तक सीमित नहीं सरकारी व्यवस्था में किसी अधिकारी की पहचान अक्सर उसके पद, कार्यालय और प्रशासनिक अधिकारों से होती है। लेकिन पंकज कुमार के लिए उनके पद का वास्तविक अर्थ कार्यालय की चारदीवारी से कहीं अधिक व्यापक है। उनके लिए शिक्षा विभाग का वास्तविक कार्यक्षेत्र वे दूरस्थ विद्य...

एक विनम्र सुझाव

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देश भर के जवाहर नवोदय और उत्तराखंड राज्य के राजीव गांधी नवोदय विधालयों की कक्षा 6 में प्रवेश हेतु प्रतिवर्ष प्रवेश परीक्षा आयोजित की जाती है । वर्तमान प्रावधानों के अनुसार कुल सीटों में 70 % सीट्स ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित स्कूलों के बच्चों तथा 30 % सीट्स शहरी क्षेत्र के स्कूलों के बच्चों हेतु आरक्षित की गयी हैं । इस प्रकार का निर्धारण वर्ष 1986 में तो सही था किंतु वर्तमान परिस्थियों में इसमें परिवर्तन लाये जाने की आवश्यकता है । क्योंकि आज ज्यादातर बड़े अंग्रेजी मध्यम के स्कूल ग्रामीण क्षेत्रों में भी खुल चुके हैं और शहरी क्षेत्रों में भी सरकारी प्राइमरी स्कूल चल रहे हैं . परिणामस्वरूप वर्तमान में इन स्कूलों में इन प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे ही प्रवेश परीक्षा में सफल होते हैं और सरकारी प्राइमरी स्कूल का बच्चा पिछड़ जाता है । अब इस प्रावधान में तत्काल परिवर्तन की आवश्यकता है अब 70 % सीट सरकारी प्राइमरी स्कूलों के बच्चों तथा 30 % सीट्स प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों हेतु आरक्षित की जा सकती हैं । तभी सच्चे अर्थों में इन स्कूलों की स्थापना किये जाने के...

आत्मीयता

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ग्रामीण इलाकों की आत्मीयता । एक नितांत अपरिचित से भी पूछ लिया जाता है कि बीड़ी पियोगे ? भले ही आज का शहरी समाज धूम्रपान को बुरा मानता हो किंतु गांव देहात में एक समय घर आए मेहमान से हुक्का और बीड़ी या चिलम के लिए भी पूछने का रिवाज हुआ करता था । यह भी सम्मान प्रकट करने का एक तरीका था कि यदि मेहमान को ऐसा कोई शौक है तो उसे भी पूर्ण किया जाय । मुझे याद आता है कि मेरे स्वर्गीय पिताजी स्वयं धूम्रपान नहीं करते थे किन्तु उनके एक मित्र घर आया करते थे तो उनके लिए उनकी पसंद के ब्रांड का बीड़ी का बंडल और माचिस सदैव उपलब्ध रखते थे ।  एक पीढ़ी थी जो ट्रेन या बस में यात्रा के समय कुछ भी खाने पीने से पहले आस पड़ोस वाले लोगों से जरूर पूछ लिया करती थी । अब वह पीढ़ी विलुप्त होती जा रही है किंतु ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई दे जाते हैं ऐसे पुराने लोग । #beokidiary #ruralbharat #rurallife