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Showing posts from September, 2026

अपना अपना परिवेश

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आज लिंक्डइन पर ही किसी पोस्ट पर यह चित्र दिखाई दिया । वाकई बहुत ही सार्थक बात कही गई है।  मैं पिछले 11 वर्षों से उत्तराखंड राज्य के दो पहाड़ी ब्लॉक में कार्य कर रहा हूं । इन दोनों ही ब्लॉक के एक एक गांव तक मेरा जाना हुआ है तथा ग्रामीण परिवेश के पले बढ़े बच्चों और उनके अभिभावकों के मध्य ही ये 11 वर्ष व्यतीत हुए हैं । हमारे साथ काफी सारे बड़े NGO और फाउंडेशन भी कार्य करते हैं जो कि ज्यादातर महानगरों में रहने वाले लोगों के द्वारा चलाए जाते हैं और उनमें कार्य करने वाले लोग भी प्रायः अंग्रेजी माध्यम में पढ़े और बड़े बड़े शहरों में पढ़ाई के बाद इनको ज्वाइन करते हैं । कई बार जो बातें शहरी माहौल के बच्चों के लिए होती हैं उन्हें ये लोग यहां ग्रामीण परिवेश के बच्चों के लिए भी लागू करने की बात करते हैं । ग्रामीण परिवेश के बच्चों का जीवन उतना सुविधा युक्त भले ही नहीं होता होगा किन्तु यहां का बच्चा अपने परिवार और परिवेश के बीच बहुत खुश रहता है । शहरी बच्चों को भले ही पढाई से स्ट्रेस होता होगा लेकिन हमारे बच्चे इस शब्द को जानते भी नहीं हैं । हालांकि घर के बड़े और टीचर लोग जरूर उन्हें...

हिंदी भाषी राज्यों में अंग्रेजी शिक्षण

आज कक्षा 10 की अंग्रेजी की पाठ्य पुस्तक देख रहा था जो कि हमारे उत्तराखंड के बच्चे पढ़ते हैं ncert की ही किताब है। चूंकि मैं स्वयं भी हिंदी माध्यम का छात्र रहा हूं और अपने स्कूली दिनों को याद करता हूं तो पाता हूं कि हम अंग्रेजी को एक भाषा नहीं बल्कि विषय समझ कर ही पढ़ते थे जिसमें पास होना जरूरी था । बहुत बाद में पता चला कि अंग्रेजी तो एक भाषा है । खैर देखता हूं कि भले ही सरकारी स्कूलों द्वारा भी कक्षा 1 से ही अंग्रेजी शुरू कर दी गई है किंतु अभी भी ग्रामीण परिवेश के हमारे बच्चों के लिए यह एक भाषा नहीं विषय ही है । जब इनकी किताबों में विदेशी लेखकों के लिखे पाठ या कविता देखता हूं तो लगता है कि हमारे पहाड़ के बच्चे उस विदेशी पृष्ठभूमि को कैसे विजुलाइज कर पाएंगे, जिनका बचपन खेत खलिहान, भेड़ बकरी और गाय के बीच बीता है और जिन्होंने रोटी, घी और अपने स्थानीय व्यंजन खाए हैं उन्हें केक, पुडिंग और कुकिंज इत्यादि से भला क्या मतलब । आज सहसा महसूस हुआ कि विदेशी लेखकों की कविता और उनके अनुभवों का भला हमारे बच्चों के जीवन में क्या काम आने वाला है । क्या कुछ ऐसा नहीं हो सकता कि हम दो तरह से अंग्रेजी सिखा...

शिक्षक दिवस स्मृति

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वर्ष 2009 था मैने सरकारी टीचर की जॉब से त्याग पत्र देकर आर्मी पब्लिक स्कूल ज्वाइन किया था। उस वर्ष मेरा शिक्षक दिवस का पहला ही अनुभव था । इसी बीच कुछ और स्कूलों में भी मैने अप्लाई कर रखा था किन्तु आर्मी स्कूल की ज्वाइनिंग पहले ही आ गई थी तो जुलाई में इधर आ गया था। मुझे कक्षा 6 का क्लास टीचर बनाया गया और दो ही महीनों में सभी बच्चों से बहुत ही घुल मिल गया था। ये बच्चे प्राइमरी विंग से आए थे और मेरा विषय भी SSt था जो कि बच्चों के लिए बहुत बोझिल भी हुआ करता था इसके अलावा इतिहास में अनेकों ऐसे बड़े बड़े शब्द आ जाते थे जो हिंदी होते थे किन्तु अंग्रेजी में ही लिखे जाते थे जैसे कि महानिभिष्क्रमण और महामाष्टकभिषेकम इत्यादि इन शब्दों को मैं हिंदी में ही लिख कर बच्चों को समझा दिया करता था जो कि उन्हें काफी सरल लगता था । खैर इसी बीच अगस्त माह का अंतिम और सितंबर का पहला हफ्ता शुरू हुआ और मैं देखता कि बच्चों द्वारा किसी योजना पर कार्य करना शुरू कर दिया गया है चूंकि ये सारे प्राइमरी विंग से ही आए थे तो पहले से एक दूसरे को जानते भी थे मैं देखता कि कक्षा में आने से पहले ये कुछ...

शिक्षक दिवस विशेष 05.9.2026

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गुरु से शिक्षक और शिक्षक से सरकारी गुरु जी और प्राइवेट स्कूलों के सर बनने तक की शिक्षकों की यात्रा । एक गांव में जन्म होने के बाद शायद शिक्षकों से मेरा परिचय शायद तभी हुआ जब स्वयं स्कूल जाना शुरू किया था।  वर्ष शायद 1978 रहा होगा हमारे गांव में उस समय तीन सरकारी स्कूल चलते थे । एक बालिका प्राइमरी जिसे कन्या पाठशाला,  एक बालक प्राइमरी जिसे प्राइमरी स्कूल और एक सहायता प्राप्त जूनियर हाई स्कूल जिसे हम बड़ा स्कूल बोला करते थे।  उसी वर्ष गांव में एक क्रांतिकारी घटना हुई और पता नहीं कैसे हरिद्वार से प्रतिदिन रेलगाड़ी से आने वाली तीन महिलाओं ने गांव के बच्चों के लिए एक मोंटेसरी स्कूल खोलने की हिम्मत कर दिखाई । उन दिनों सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी कक्षा 6 से सिखाई जाती थी और इन मैडमों जिन्हें हम बच्चे आंटी जी बोलते थे ने गांव वालों को बताया कि हम नर्सरी से ही बच्चों को A B C D सिखाया जाना शुरू करेंगे । उनके इस क्रांतिकारी विचार से गांव के कुछ परिवार प्रभावित हुए और उन्होंने अपने बच्चों का प्रवेश गांव के सरकारी प्राइमरी में न करा कर इस नए स्कूल में करा दिया । उन दिनों ...