सरकारी स्कूलों का योगदान
अक्सर सुनने में आता है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था से निकले बच्चे सफल नहीं हो पा रहे और वर्तमान में तो सरकारी स्कूलों और शिक्षकों को समाज में एक बहुत बड़ा खलनायक सा बना कर दिखाया भी जा रहा है। मैं स्वयं भी एक ग्रामीण परिवेश और सरकारी स्कूलों से ही पढ़ा हूं । यही विचार मन में आ रहा था कि आखिर सरकारी स्कूल क्या वाकई कुछ नहीं कर रहे।हमारी व्यवस्था प्राइमरी स्कूलों से शुरू होकर माध्यमिक तक जाती है प्राथमिक शिक्षा में बच्चों और शिक्षकों दोनों के लिए लिए अलग अलग तरह के संघर्ष होते हैं किंतु जैसे ही बच्चा हमारे किसी हाई स्कूल या इंटर कॉलेज में आ जाता है तो उसकी पढ़ाई में काफी अंतर आ जाता है। प्राइमरी के मुकाबले अब पढ़ाई ज्यादा व्यवस्थित हो जाती है और बच्चे को अलग अलग विषय के शिक्षक भी मिलने शुरू हो जाते हैं जहां प्राइमरी स्कूलों में आज भी 60 बच्चों तक RTE Act के अनुसार 02 शिक्षकों का ही मानक है तो वही दो शिक्षक कैसे 05 कक्षाओं के अलग अलग विषय पढ़ा रहे होंगे यह भी सोचने वाली बात है।सरकारी माध्यमिक स्कूलों से कक्षा 12 पास करने वाले बच्चे भी सफल होते हैं किंतु शायद उनकी सफलता अखबारों की सुर्खी नहीं बन पाती जैसा कि अंग्रेजी माध्यम के बच्चों से बन जाती है । आइए एक तुलना करते हैं ।
1.सरकारी स्कूलों के पढ़े बच्चे रक्षा सेनाओं, अर्धसैनिक बल और पुलिस में बड़ी संख्या में जवान के रूप में सेवा में चयनित होते हैं किंतु कहीं कोई जिक्र नहीं होता, जिक्र सिर्फ अफसर के रूप में ही चयनित होने वाले युवाओं का होता है ।
2.सरकारी हिंदी माध्यम से पढ़े बच्चे बड़ी संख्या में ITI और पॉलीटेक्निक करते हैं और फिर विभिन्न फैक्ट्रियों में नौकरी करते हैं लेकिन जिक्र सिर्फ IIT और JEE mains के बाद बड़े पैकेज पर चयनित होने वालों की ही बात समाज करता है ।
3.सरकारी स्कूलों के ही बच्चे बड़ी संख्या में राज्य और केंद्र सरकार की नौकरियों ग्रुप C की विभिन्न नौकरियों में भी बड़ी संख्या में चयनित होते हैं लेकिन मीडिया और समाज सिर्फ बात IAS और PCS जैसी परीक्षा में ही चुने युवाओं की बात करता है ।
4. ग्रामीण परिवेश के सरकारी स्कूलों से पढ़े बच्चे अपने परिवार के विभिन्न व्यवसायों को भी आगे बढ़ाते दिखाई देते हैं जिसमें पशुपालन, खेती इत्यादि भी हैं जिनकी बात भी कोई नहीं करता।देश भर में असंख्य फैक्ट्री में असंख्य लोग काम कर रहे हैं और देश की अर्थ व्यवस्था में अपना योगदान दे रहे हैं जिनके बिना किसी IIT और IIM से पढ़ा हुआ मैनेजर भी कुछ नहीं कर सकता लेकिन इनके योगदान की कोई भी बात करता दिखाई नहीं देता ।
5.बड़ी संख्या में सरकारी स्कूलों से ही हिंदी माध्यम में पढ़ा युवा शिक्षक भी बनता है किसी भी शिक्षक शिक्षा BEd या डीएलएड इत्यादि कॉलेज की संख्या में सबसे ज्यादा युवा सरकारी स्कूलों से ही मिलेंगे जो आगे चल कर सरकारी ही नहीं विभिन्न अच्छे निजी स्कूलों और डिग्री कालेज के प्रोफेसर भी बनते हैं जिनका का भी कोई जिक्र नहीं करता।बस कहीं न कहीं इन सभी कार्यों और इन नौकरियों की कोई बात नहीं करता दिखाई देता क्योंकि शायद समाज इनका स्तर बहुत छोटा आंकता होगा जबकि इन सभी कार्यों के बिना देश चल भी नहीं सकता। और अंत में यह भी लिखना समीचीन होगा कि ऐसा भी नहीं है कि हमारे सरकारी स्कूलों से निकले बच्चे अफसर नहीं बनते,ऐसे भी उदाहरण हमारे सामने आते हैं भले ही विभिन्न कारणों के चलते उनकी संख्या कम होती है।यह भी तथ्य है कि ग्रामीण परिवेश का बच्चा बिना किसीट्यूशन के अपनी कक्षा12 पास कर देश की वर्कफोर्स ज्वाइन कर लेता है।
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