अपना अपना परिवेश
आज लिंक्डइन पर ही किसी पोस्ट पर यह चित्र दिखाई दिया । वाकई बहुत ही सार्थक बात कही गई है। मैं पिछले 11 वर्षों से उत्तराखंड राज्य के दो पहाड़ी ब्लॉक में कार्य कर रहा हूं । इन दोनों ही ब्लॉक के एक एक गांव तक मेरा जाना हुआ है तथा ग्रामीण परिवेश के पले बढ़े बच्चों और उनके अभिभावकों के मध्य ही ये 11 वर्ष व्यतीत हुए हैं । हमारे साथ काफी सारे बड़े NGO और फाउंडेशन भी कार्य करते हैं जो कि ज्यादातर महानगरों में रहने वाले लोगों के द्वारा चलाए जाते हैं और उनमें कार्य करने वाले लोग भी प्रायः अंग्रेजी माध्यम में पढ़े और बड़े बड़े शहरों में पढ़ाई के बाद इनको ज्वाइन करते हैं । कई बार जो बातें शहरी माहौल के बच्चों के लिए होती हैं उन्हें ये लोग यहां ग्रामीण परिवेश के बच्चों के लिए भी लागू करने की बात करते हैं । ग्रामीण परिवेश के बच्चों का जीवन उतना सुविधा युक्त भले ही नहीं होता होगा किन्तु यहां का बच्चा अपने परिवार और परिवेश के बीच बहुत खुश रहता है । शहरी बच्चों को भले ही पढाई से स्ट्रेस होता होगा लेकिन हमारे बच्चे इस शब्द को जानते भी नहीं हैं । हालांकि घर के बड़े और टीचर लोग जरूर उन्हें थोड़ा बहुत पढ़ाई का डर दिखाते हैं ताकि वो पढ़ाई को गंभीरता से लें । शहरी लोग जो कार्य जीवन भर नहीं कर पाते यहां बच्चा बहुत ही कम आयु में करना सीख जाता है और जिम्मेदारी भी उठाना शुरू कर देता है ।
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