हिंदी भाषी राज्यों में अंग्रेजी शिक्षण
आज कक्षा 10 की अंग्रेजी की पाठ्य पुस्तक देख रहा था जो कि हमारे उत्तराखंड के बच्चे पढ़ते हैं ncert की ही किताब है। चूंकि मैं स्वयं भी हिंदी माध्यम का छात्र रहा हूं और अपने स्कूली दिनों को याद करता हूं तो पाता हूं कि हम अंग्रेजी को एक भाषा नहीं बल्कि विषय समझ कर ही पढ़ते थे जिसमें पास होना जरूरी था । बहुत बाद में पता चला कि अंग्रेजी तो एक भाषा है । खैर देखता हूं कि भले ही सरकारी स्कूलों द्वारा भी कक्षा 1 से ही अंग्रेजी शुरू कर दी गई है किंतु अभी भी ग्रामीण परिवेश के हमारे बच्चों के लिए यह एक भाषा नहीं विषय ही है । जब इनकी किताबों में विदेशी लेखकों के लिखे पाठ या कविता देखता हूं तो लगता है कि हमारे पहाड़ के बच्चे उस विदेशी पृष्ठभूमि को कैसे विजुलाइज कर पाएंगे, जिनका बचपन खेत खलिहान, भेड़ बकरी और गाय के बीच बीता है और जिन्होंने रोटी, घी और अपने स्थानीय व्यंजन खाए हैं उन्हें केक, पुडिंग और कुकिंज इत्यादि से भला क्या मतलब । आज सहसा महसूस हुआ कि विदेशी लेखकों की कविता और उनके अनुभवों का भला हमारे बच्चों के जीवन में क्या काम आने वाला है । क्या कुछ ऐसा नहीं हो सकता कि हम दो तरह से अंग्रेजी सिखायें एक सामान्य जीवन में काम आने वाली और दूसरी साहित्यिक जिसमें बच्चे को आगे बढ़ना है मसलन यदि एक बच्चे को कक्षा 10 या 12 के बाद ही ITI या पॉलिटेक्निक या इंजीनियरिंग करके तकनीकी क्षेत्र या किसी दूसरे व्यवसाय में जाना है तो उसे रॉबर्ट फ्रास्ट या फिर विलियम शेक्सपियर पढ़ाये जाने की क्या जरूरत है । उसके भावी जीवन में काम आने वाली अंग्रेजी पढ़ाई जा सकती है ये विदेशी लेखकों और उनके सौंदर्यबोध के पाठ उन बच्चों के लिए तो सही प्रतीत होते हैं जिन्हें आगे चल कर साहित्यिक अंग्रेजी को अपने जीवन यापन का जरिया बनाना है। बचपन में पढ़ी एक भी विदेशी लेखक की कोई कविया या पाठ मुझे आज भी याद नहीं आता किंतु अपनी हिंदी के एक एक पाठ और कविता को याद रखता हूं । खैर मैं तो हिंदी पट्टी का एक अदना सा आदमी हूं भला इतना बड़ा विचार कैसे दे सकता हूं क्योंकि शिक्षा नीति इत्यादि तो बड़े बड़े दिमाग वाले लोग तय करते हैं । मेरा समय तो इन आम से लोगों के बीच एक आम ही आदमी की तरह कटता है । जिनकी अपनी जीवन शैली है, अपना विशिष्ट पहनावा है और खानपान और जीवन यापन का तरीका है जो इन किताबों में लिखे पाठों से तो बिल्कुल भी मेल नहीं खाता । खैर नीतियां तो बड़े बड़े लोग बनाते हैं हम आम आदमी भला क्या जानें कि किसको क्या पढ़ाया जाना चाहिए ।
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