सरकारी स्कूलों का रख रखाव
स्कूलों का रखरखाव और बजट
आजकल सरकारी स्कूलों की खराब दशा की और सभी का ध्यान जा रहा है। सभीसरकारी स्कूलों को समग्र शिक्षा के अंतर्गत प्रति वर्ष स्कूल मेंटिनेंस ग्रांट मिलता है जो कि विद्यालय की छात्र संख्या के ऊपर निर्धारित होता है । इसके अनुसार किसी भी विद्यालय को कम से कम दस हजार और अधिकतम डेढ़ लाख तक की धनराशि वार्षिक मिल सकती है । जिन स्कूलों में छात्र संख्या अच्छी होती है वहां यह धनराशि अधिक होती है और जिन स्कूलों में छात्र संख्या कम वहां यह दस हजार ही हो सकती है । इसी धनराशि में पूरे वर्ष शिक्षकों को अपने स्कूल की विभिन्न आवश्यकताएं जैसे चॉक, डस्टर, स्टेशनरी, छोटी मोटी मरम्मत, वर्ष में दो या तीन बार बच्चों और अभिभावकों हेतु मिठाई और चाय इत्यादि की व्यवस्था और अन्य खर्च । हालांकि कुछ अन्य अनुदान भी मिलते हैं जैसे कि खेल सामग्री खरीदने हेतु पांच हजार, इको क्लब भी पांच हजार, लाइब्रेरी भी इतना ही जिससे फिर यही सब सामान स्कूल को खरीदना होता है ।स्कूल को जो भी बजट प्राप्त होता है उसके सदुपयोग हेतु प्रत्येक विद्यालय का बैंक खाता होता है जिसे विद्यालय के हेड शिक्षक तथा smc अध्यक्ष के द्वारा संचालित किया जाता है ।हेड शिक्षक द्वारा किसी भी बजट को खर्च करने से पूर्व smc बैठक में किसी भी खर्च से पहले उसका प्रस्ताव smc से अनुमोदित कराया जाना आवश्यक होता है । इसी प्रकार वर्ष भर स्कूल का प्रबंधन चलता है।हमारे स्कूलों में सबसे बड़ी दिक्कत है कि एक बार भवन बन जाने के बाद निर्धारित अवधि के बाद उसकी मरम्मत या रखरखाव हेतु कोई बजट अलग से अपने ही आप प्राप्त नहीं होता।उदाहरण हेतु यदि किसी विद्यालय का नवीन भवन बन गया है तो उसके रख रखाव और रंग रोगन हेतु अगली धनराशि स्वीकृत कराए जाने की प्रक्रिया बहुत लंबी और बहुत समय लगने वाली होती है।वर्ष में एक बार AWP बनता है जिसमें ऐसे स्कूलों के smc प्रस्ताव और फोटो मंगवा कर जिले को भेजे जाते हैं, जिले से प्रदेश स्तर तथा फिर भारत सरकार के स्तर से अनुमोदन प्राप्त होने पर समग्र शिक्षा के माध्यम से प्रति वर्ष कुछ न कुछ स्कूलों के नए भवन बनते हैं और लघु और वृहद मरम्मत भी होती है किंतु इनकी संख्या आवश्यकता के मुकाबले बहुत कम हो सकती है ।समग्र शिक्षा के अतिरिक्त अन्य योजनाओं से भी स्कूलों को बजट प्राप्त होता है जैसे जिला योजना, विधायक,सांसद निधि, csr, राज्य योजना इत्यादि। किंतु उपरोक्त सभी मदों से कार्य कराए जाने हेतु अध्यापक या किसी स्थानीय व्यक्ति को ही बहुत भाग दौड़ करनी पड़ जाती है और भाग दौड़ करने वाले अपने स्कूलों हेतु कुछ न कुछ बजट प्राप्त भी कर ही लेते हैं।इस समस्या से बचने का एक उपाय हो सकता है कि स्कूलों को बिना मांगे एक निश्चित समय जैसे कि 3 या 5 वर्ष के बाद रंग रोगन और छोटी मोटी मरम्मत हेतु निश्चित धनराशि उपलब्ध कराई जानी चाहिए।दूसरा पूर्व मनरेगा और वर्तमान जी राम जी योजना में सभी ग्राम पंचायतों हेतु अपने बजट का कुछ हिस्सा प्रतिवर्ष गांव के प्राइमरी स्कूल हेतु खर्च करना भी अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। देखने में आता है कि मनरेगा की मजदूरी दर बाजार से कम होने के कारण इसके अंतर्गत कोई भी मजदूर काम करने को तैयार नहीं होता।वर्तमान समय में सरकारी स्कूलों के प्रति लोगों की सोच में बहुत बड़ा बदलाव भी देखने को मिला है जहां अब लोग स्कूल के लिए अपने स्तर से कोई भी खर्च करने को तैयार दिखाई नहीं देते हालांकि सभी स्थानों पर ऐसा नहीं होता होगा। जब तक स्थानीय जन समुदाय सहयोग नहीं करेगा सरकारी स्कूलों की दशा में सुधार असंभव सा ही लगता है।
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