बंद होते स्कूल
यह भी एक ज्वलंत विषय है कि आखिरकार इतने प्रयासों के बावजूद भी बच्चे सरकारी स्कूलों से निजी स्कूलों की और क्यों जा रहे हैं । ग्रामीण क्षेत्रों के अपने 11 वर्ष के अनुभव में मैने पाया है कि थोड़ी बहुत आर्थिक स्थिति सही होते ही अभिभावक सामाजिक प्रतिष्ठा और सामाजिक स्वीकृति प्राप्त करने के उद्देश्य से भी अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ने के लिए भेज रहे हैं । दूसरी बात हमारे स्कूलों में कई बार दुर्गम इलाकों में शिक्षकों की कमी भी होती है और विभिन्न कारणों से शिक्षकों की स्कूल से अनुपस्थिति भी एक बड़ा कारण होता है। कई बार शिक्षक भी उपलब्ध हैं किंतु विद्यालय भवन और अच्छा फर्नीचर और अन्य सामग्री स्मार्ट बोर्ड इत्यादि भी दिखाई नहीं देते जो कि निजी स्कूल जुटा लेते हैं । और शायद अंतिम कारण कि सरकारी स्कूलों में सब कुछ फ्री भी मिलने लगा है और अब शायद एक वर्ग ऐसा तैयार भी हो रहा है जो फ्री के तमगे से बचना चाहता है क्योंकि अब उनकी आर्थिक स्थिति निजी स्कूल की फीस वहन कर सकती है । एक बड़ा कारण अंग्रेजी माध्यम का मोह भी है ही ।
अंत में ऐसा भी अनुभव है कि सभी सरकारी स्कूलों से भी लोगों का मोह भंग नहीं हुआ है आज भी केंद्रीय विद्यालयों, जवाहर नवोदय विद्यालयों, पुराने समय के सैनिक और मिलिटरी स्कूलों की साख बनी हुई है और अब तो सरकार का भी प्रयास है कि राज्य के प्रत्येक ब्लॉक में एक केंद्रीय विद्यालय की स्थापना कर दी जाय । विकास खंड मोरी जैसे अत्यंत दूरस्थ स्थान पर भी जनता की यह बहुत बड़ी मांग है जबकि यहां पहले से ही लगभग 08 किलोमीटर के दायरे में ही राज्य सरकार द्वारा 01 इंटर कॉलेज, 01 कन्या हाई स्कूल और 02 जूनियर हाई स्कूल चल रहे हैं जिनमें बच्चों की संख्या भी घटती जा रही है जबकि जनता की मांग इसी स्थान पर एक और केंद्रीय विद्यालय खोलने की भी है । यानी जनता का मोह सरकारी स्कूलों से तो भंग नहीं हुआ । कहीं न कहीं राज्य सरकारों को भी चिंतन मनन करना होगा कि किस प्रकार से अपने स्कूलों को भी केंद्रीय स्कूलों के ही समकक्ष बनाया जाय । सीमित परिवार भी इसका एक बड़ा कारण है पूर्व में जहां चार या पांच बच्चे होना सामान्य बात थी आज एक या दो ही बच्चों तक परिवार सीमित हो चले हैं और यह प्रवृत्ति ग्रामीण परिवेश में भी दिखाई देती है ।
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